आप सभी लोगों को पता है की हिमाचल प्रदेश अपने त्योहारों , सांस्कृतिक एवं मुख्य अनुष्ठानों के लिए बहुत ही प्रशिद है
हिमाचल का हर जगह , जिला , किसी न किसी , त्योहार, सांस्कृतिक यह फिर किसी न किसी अनुष्ठान के लिए जाना जाता है।
आज हम हिमाचल के कुछ त्योहारों के बारे में आपको बताना चाहते हैं जिनकी अपनी जगह में बहुत महत्ब है।
1 ) कुल्लू दशहरा (Kullu Dussehra)
कुल्लू का दशहरा देश विदेश में बहुत ही पॉपुलर है। इस दशहरे में दुनिआ भर के लोग आते है इसका एक भव्य उद्घाटन किया जाता है।
इसकी विशेषता यह है की इसकी शुरुआत जब देश में जहाँ दशहरा खत्म होता है, वहीं यह कुल्लू घाटी में इसकी शुरुआत होती है।

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कुल्लू दशहरा का मुख्या आकर्षण : कुल्लू दशहरा विश्व प्रसिद्ध उत्सव है जिसमे 200 से अधिक देवी देवताओं के भव्य रथ यात्रा निकाली जाती है। इस का लाइव प्रशारण होता है , हिमाचल प्रदेश के गणमान्य लोग इस अवसर पर मजूद होतें हैं। इस मेले में देवताओं का महामिलन या देव सम्मेलन भी कहा जाता है, जहाँ आस्था और संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। देश विदेश से लोग देखने के लिए आते हैं।
कुल्लू दशहरा 7 दिन चलता है , और कुल्लू घाटी में मनाया जाता है।
2 ) मंडी शिवरात्रि (Mandi Shivratri)
मंडी शिवरात्रि जो की “छोटी कशी ” से भी लोग जानते हैं। यह एक हिमाचल प्रदेश का बहुत ही प्रसिद्द धार्मिक एवं सांस्कृतिक उत्सव है , यह पर्व भगवान शिव जी को समर्पित है। यह हिमाचल मंडी शहर में मनाया जाता है।
मंडी शिवरात्रि का मुख्या आकर्षण : यह सात दिनों तक मेला चलता है। इस छोटी कशी में दुनिया भर के लोग शिवरात्रि पर आते हैं , और यंहा पर सेकंडों देवी देवताओं की शोभायात्राएँ निकाली जाती है ।
यह सात दिनों तक मेला चलता है। इस छोटी कशी में दुनिया भर के लोग शिवरात्रि पर आते हैं , यंहा पर सेकंडों देवी देवताओं की शोभायात्राएँ निकाली जाती है , भजन कीर्तन , सांस्कृतिक कार्यक्रम और पारंपरिक मेल-मिलाप होता है, एक से एक गायक अपनी परफॉरमेंस देते हैं देखने में बहुत ही आकर्षक लगता है। यह भक्ति , आस्था और लोक संस्कृति का प्रतीक है।
मंडी शिवरात्रि उत्सव महाशिवरात्रि के दिन से ही शुरू और सात दिनों तक चलता है।
3) किन्नौर का फूलैच (Phulaich) / फूल उत्सव
यह और किन्नौर का एक प्रसिद्ध फूलैच उत्सव है। फूलैच को “फूलों का त्योहार” भी कहा जाता है।
इसमें गांव् के लोग उच्च पहाड़ियों से जंगली फूलों से विशेष फूल चुनकर लाते हैं जिनको लोकल भाषा में “माथा” भी कहते हैं।
फूलैच इस त्यौहार की विशेषता : यह त्यौहार पूर्वजों और देवी देवताओं को समर्पित होता है। उन फूलों को देवताओं को अर्पित किया जाता है। इसके बाद पूरे गाँव में इन फूलों को बाँटा जाता है और लोग इन्हें आशीर्वाद स्वरूप अपने घर ले जाते हैं। इस दौरान संगीत, नृत्य और लोकगीतों और भोज का आयोजन होता है। यह उत्सव किन्नौर की समृद्ध लोकसंस्कृति को दर्शाता है। फूलैच उत्सव (किन्नौर, हिमाचल प्रदेश) की अवधि लगभग 7 से 10 दिन होती है।
4) फागली (Fagli ) / फागुल पर्व
फागली हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति और किन्नौर क्षेत्रों में मनाया जाने वाला एक प्रमुख पारंपरिक उत्सव है।
इस पर्व की विशेषता: यह है की इस उत्सव का मुख्य संदेश बुराई पर अच्छाई की विजय, अंधकार पर प्रकाश की जीत है, और फसल कटाई के बाद वसंत ऋतु का स्वागत और स्थानीय संस्कृति और समृद्धि का प्रतीक का पर्व माना जाता है।
लोग विशेष रंग विरंगे मुखौटे पहनकर नाचते हैं, टॉर्च और दीपक जलाते हैं, स्थानीय भाषा में इसको “बुशान” या “बुशेश” कहा जाता है। अपनी घरों को खूब सजाते हैं।
इस दिन देवी देवताओं की गॉवों में पूजा की जाती है और घर-घर जाकर समृद्धि व खुशहाली की प्रार्थना की जाती है। लोक नृत्य , लोकगीत , नृत्य किये जाते हैं और मिलजुल कर भोजन करते हैं।
यह पर्व प्रायः फरवरी महीने में, शीत ऋतु के अंत और वसंत के आगमन पर मनाया जाता है।
5 ) सैर उत्सव (Sair Festival)
सैर पर्व हिमाचल के अधिकतर भागों में मनाया जाता है , मंडी, कांगड़ा, हमीरपुर, बिलासपुर, सोलन, शिमला, कुल्लू और भी कई अन्य
इस पर्व की विशेषता : यह बरसात के मौसम की विदाई और नई फसल के स्वागत के रूप में मनाया जाता है। सैर उत्सव को प्रकृति, फसल और पशुधन के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक माना जाता है।
इस अवसर पर स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा एवं शोभायात्राएँ भी निकाली जाती हैं , श्रद्धा के साथ गाँवों में लाया जाता है। इस दिन लोग अपनी नई फसल और मवेशियों की पूजा करके प्रकृति और देवताओं का आभार व्यक्त करते हैं। लोग मक्की, खीरा, अखरोट, कद्दू, चावल जो भी नया फल आदि से देवताओं को भोग लगाया जाता है और परिवार और समाज में , पकबान और उपहार एक दूसरे को आदान प्रदान करते हैं। इस दिन लोग सांस्कृतिक कार्योक्रमों का आयोजन करते हैं जिसमे लोकगीत , न्रत्य और मेले इत्यादि होते हैं।
सैर उत्सव सितंबर के मध्य में मनाया जाता है। यह उत्सव हिमाचल की सामाजिक एकता और सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने वाला त्योहार है ।
6) बसोआ / बिशु (Basoa / Bishu Festival)
बसोआ / बिशु हिमाचल प्रदेश में कई हिस्सों जैसे किन्नौर, लाहौल-स्पीति, हमीरपुर, बिलासपुर, कांगड़ा, चम्बा , मंडी और भी कई हिस्सों में मनाया जाने वाला एक प्राचीन लोक पर्व है।
उत्सव की विशेषता: इस पर्व को नई फसल काटने की बाद और वसंत ऋतु के आगमन पर मनाया जाता है।
बसोआ के दौरान गाँव के लोग अपने देवी-देवताओं और पूर्वजों की पूजा करते हैं। नए नए व्यंजन और पकवानों से पारिवारिक देवी-देवताओं और पूर्वजों की पूजा करते हैं।
इस उत्सव में लोग सामूहिक मेलों का आयोजन, सांस्कृतिक कार्यक्रम , रंग रंग-बिरंगे परिधानों में लोक नृत्य , लोकगीत एवं संगीत प्रस्तुत करते हैं।
कई जगाओं पर खेलों , कुस्ती यह दंगल का भी आयोजन होता है।
यह त्योहार गाँववासियों के बीच भाईचारा बढ़ाने और समुदायिक जीवन को मज़बूत करने का भी है।
बसोआ उत्सव बैसाख (अप्रैल) में मनाया जाता है। स्थानीय समुदायों में खुशहाली, समृद्धि और सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है।
इस तरह से और भी हमारे बहुत सारे पर्व , उस्तव यह त्योहार हैं , जो की हमे हमारे हिमाचली संस्कृति , समाजकिता को जोड़े रखते हैं।