वर्ल्ड हिमाचली ऑर्गेनाइजेशन (WHO) दिल्ली इकाई ने किया वृक्षारोपण अभियान का सफल आयोजन
वर्ल्ड हिमाचली ऑर्गेनाइजेशन (WHO) की दिल्ली इकाई द्वारा हिमाचल भवन, मंडी हाउस, नई दिल्ली में संगठन की पहली बैठक एवं विशेष वृक्षारोपण अभियान का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य संगठन की आगामी योजनाओं पर चर्चा करने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक जिम्मेदारियों को बढ़ावा देना था।
बैठक की अध्यक्षता दिल्ली इकाई के अध्यक्ष मनोज डोगरा ने की। इस अवसर पर संगठन के पदाधिकारी, कार्यकारिणी सदस्य एवं अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
कैप्टन विक्रम बत्रा की स्मृति में वृक्षारोपण अभियान
बैठक के बाद संगठन द्वारा कारगिल युद्ध के वीर योद्धा कैप्टन विक्रम बत्रा की स्मृति में वृक्षारोपण अभियान चलाया गया। “एक पेड़ शहीद कैप्टन विक्रम के नाम”, “येह दिल मांगे मोर” – इस अभियान के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण, हरियाली बढ़ाने और आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ वातावरण बनाने का संदेश दिया गया।
कार्यक्रम में उपस्थित सदस्यों ने पौधारोपण करते हुए पर्यावरण संरक्षण को प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी बताया। उन्होंने कहा कि पेड़-पौधे केवल प्रकृति की सुंदरता नहीं बढ़ाते, बल्कि जीवन के लिए आवश्यक स्वच्छ हवा और संतुलित पर्यावरण प्रदान करते हैं।
संगठन के पदाधिकारियों की रही उपस्थिति
अध्यक्ष मनोज डोगरा , उपाध्यक्ष नरेश ठाकुर , उपाध्यक्ष अजीत चौहान , सीमा शर्मा, महासचिव अमित कुमार शर्मा , कार्यलय सचिव ललित डोगरा , सचिव जीवन शर्मा , कोषाध्यक्ष कुशल चंद कटोच, सचिव शिवानी ठाकुर , सचिव रिया ठाकुर , कार्यकारणी सदस्य अंजू अरोड़ा, दिनेश डोगरा, योगेंद्र लाल शर्मा, पवन शर्मा, सुरेश पाठियाल, पूजा मेहरा सहित कई सदस्य उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ हिमाचली संस्कृति और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में संगठन की भूमिका को मजबूत करने पर भी चर्चा की गई।
(WHO) दिल्ली इकाई ने कहा कि संगठन हिमाचली समुदाय को एक मजबूत मंच प्रदान करने के साथ-साथ सामाजिक सेवा, सांस्कृतिक संरक्षण और पर्यावरण जागरूकता के क्षेत्र में निरंतर कार्य करता रहेगा।
संगठन के सदस्यों ने भविष्य में भी ऐसे अभियानों को जारी रखने का संकल्प लिया और सभी लोगों से पर्यावरण संरक्षण में सक्रिय भागीदारी करने की अपील की।
वृक्षारोपण अभियान को सहयोग करने के लिए हार्दिक आभार
इस अभियान में वर्ल्ड हिमाचली ऑर्गेनाइजेशन (WHO) दिल्ली इकाई को सहयोग करने के लिए नवदीप सिंह थापा, उप महाप्रबंधक हिमाचल भवन , गुरुबचन सिंह जनरल असिस्टेंट बड़ोदा हाउस , नार्दन रेलवे मुख्यालय , ललित वर्मा सहायक महाप्रबंधक, हिमाचल सदन , नई दिल्ली , इन सभी सदस्यों का हार्दिक आभार किया।
हिमाचली लगन मुंडुप या वेद: कन्या विवाह में सात फेरों के पवित्र लकड़ी के अनुष्ठान की परंपरा
हिमाचल प्रदेश अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, गहरी जड़ें जमाए परंपराओं और विशिष्ट विवाह संस्कारों के लिए जाना जाता है, जो भारत के मैदानी क्षेत्रों से काफी भिन्न हैं। हिमाचल के प्रत्येक क्षेत्र में ऐसे रीति-रिवाज प्रचलित हैं, जो प्रकृति, पूर्वजों और सामुदायिक मूल्यों से गहराई से जुड़े हुए हैं। इन पवित्र परंपराओं में हिमाचली मुंडुप, जिसे कई क्षेत्रों में वेद भी कहा जाता है, कन्या विवाह के संस्कारों में एक विशेष और महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
लगन मुंडुप या वेद केवल एक अनुष्ठानिक वस्तु नहीं है, बल्कि यह परंपरा, पवित्रता, जिम्मेदारी और पीढ़ी दर पीढ़ी मिलने वाले आशीर्वाद का प्रतीक है। पारंपरिक रूप से इसे साधारण लकड़ी के स्वरूप में तैयार किया जाता है, जो हिमाचली ग्रामीण जीवन को दर्शाने वाली इसकी प्राकृतिक और पावन पहचान को और भी सशक्त बनाता है। आज भी हिमाचल प्रदेश के कई ग्रामीण क्षेत्रों में विवाह के अवसर पर, विशेष रूप से सात फेरों के समय, मुंडुप को बड़े आदर और श्रद्धा के साथ सुरक्षित रखकर प्रयोग किया जाता है।
प्रश्न 1: हिमाचली लगनमुंडुप या वेद क्या है? उत्तर:मुंडुप (या वेद) हिमाचली हिंदू विवाह परंपराओं में प्रयुक्त एक पारंपरिक अनुष्ठानिक वस्तु है, जिसका संबंध मुख्य रूप से कन्या पक्ष से होता है। इसका उपयोग विवाह के महत्वपूर्ण संस्कारों के दौरान किया जाता है, विशेष रूप से पवित्र अग्नि के चारों ओर सात फेरों के समय।
पारंपरिक हिमाचली विवाहों में लगनमुंडुप प्रायः
लकड़ी की संरचना में होता है ।
सरल डिज़ाइन वाला होता है ।
अधिक सजावट से मुक्त होता है ।
स्थानीय रूप से उपलब्ध लकड़ी से निर्मित किया जाता है।
मुंडुप की पारंपरिक लकड़ी की संरचना हिमाचली मुंडुप की सबसे सुंदर और विशेष पहचान इसकी पारंपरिक लकड़ी की बनावट है।
प्रयुक्त सामग्री
स्थानीय रूप से प्राप्त लकड़ी (अक्सर देवदार या अन्य पवित्र मानी जाने वाली लकड़ी)
चिकनी की गई, लेकिन अत्यधिक पॉलिश रहित सतह
किसी भी प्रकार के कृत्रिम रंगों या आधुनिक सामग्री का प्रयोग नहीं
लकड़ी का प्राकृतिक रंग
सरल, मजबूत और स्थिर संरचना
दशकों तक टिकाऊ रहने के उद्देश्य से निर्मित
लकड़ी से निर्मित लगनमुंडुप प्रतीक है:
विवाह की मजबूती का
पारिवारिक जीवन की स्थिरता का
धरती और पूर्वजों से जुड़े आध्यात्मिक संबंध का
हिमाचली संस्कृति में लकड़ी को पवित्र और शुभ माना जाता है, क्योंकि यह सीधे प्रकृति से प्राप्त होती है। इसी कारण धातु या आधुनिक सजावटी वस्तुओं की अपेक्षा लकड़ी से बना मुंडुप अधिक शुभ और उपयुक्त माना जाता है।
सात फेरों के दौरान लगन मुंडुप का उपयोग कैसे किया जाता है?
सात फेरे हिंदू विवाह का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण भाग माने जाते हैं। हिमाचली विवाह परंपराओं में इन फेरों के दौरान लगन मुंडुप or वेद की विशेष उपस्थिति होती है।
फेरों के समय मुंडुप की भूमिका
क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार मुंडुप को रखा या धारण किया जाता है
बुजुर्ग महिलाएँ और परिवार के वरिष्ठ सदस्य कन्या को इस अनुष्ठान के सम्मान और विधि का मार्गदर्शन करते हैं
लकड़ी से बना मुंडुप पवित्र अग्नि के समीप रखा जाता है
हिमाचली परंपरा में प्रत्येक फेरे का क्या अर्थ है?
हिमाचली परंपरा में प्रत्येक फेरा अलग-अलग मूल्य और संकल्प का प्रतीक होता है, जैसे कर्तव्य, विश्वास, समृद्धि, सम्मान, स्वास्थ्य, सामंजस्य और आजीवन बंधन।
प्रथम फेरा – कर्तव्य : दैनिक जीवन में एक-दूसरे का साथ निभाने और जिम्मेदारियाँ साझा करने का वचन।
द्वितीय फेरा – विश्वास : विवाह में आपसी भरोसा, ईमानदारी और निष्ठा बनाए रखने की प्रतिज्ञा।
तृतीय फेरा – समृद्धि : परिवार की उन्नति और सुख-समृद्धि के लिए मिलकर कार्य करने का संकल्प।
चतुर्थ फेरा – सम्मान : पति-पत्नी और दोनों परिवारों के बीच आपसी सम्मान बनाए रखने का वचन।
पंचम फेरा – स्वास्थ्य : शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की कामना तथा एक-दूसरे का ध्यान रखने का संकल्प।
षष्ठ फेरा – सामंजस्य: समझदारी, शांति और प्रेमपूर्ण वैवाहिक जीवन जीने की प्रतिज्ञा।
सप्तम फेरा – आजीवन बंधन : हर कठिन परिस्थिति में साथ निभाने और जीवनभर एक-दूसरे के साथ रहने का वचन।
इन सभी पवित्र वचनों की जिम्मेदारी और पावनता का प्रतीक मुंडुप माना जाता है।
प्रश्न 1: हिमाचल प्रदेश में मुंडुप का सांस्कृतिक महत्व क्या है? उत्तर: मुंडुप वेद हिमाचली संस्कृति में पवित्रता और सरलता का प्रतीक माना जाता है। यह विवाह संस्कारों में परंपराओं और संस्कारों को बनाए रखने का माध्यम है।
प्रश्न 2: मुंडुप को पूर्वजों के आशीर्वाद का प्रतीक क्यों माना जाता है? उत्तर: मुंडुप पीढ़ी दर पीढ़ी सुरक्षित रखकर प्रयोग किया जाता है, जिससे यह पूर्वजों की कृपा और आशीर्वाद का प्रतिनिधित्व करता है।
प्रश्न 3: मुंडुप पारंपरिक मूल्यों की याद कैसे दिलाता है? उत्तर: इसकी सरल बनावट और पारंपरिक उपयोग विवाह में संयम, सम्मान और जिम्मेदारी जैसे मूल्यों को स्मरण कराते हैं।
प्रश्न 4: क्या मुंडुप बुरी नजर से रक्षा करता है? उत्तर: हिमाचली मान्यताओं के अनुसार मुंडुप विवाह के समय कन्या को नकारात्मक ऊर्जा और बुरी नजर से सुरक्षित रखने का प्रतीक माना जाता है।
प्रश्न 5: मुंडुप का लकड़ी का स्वरूप क्या संदेश देता है? उत्तर: लकड़ी से बना मुंडुप यह दर्शाता है कि विवाह प्राकृतिक, मजबूत और स्थायी होना चाहिए।
प्रश्न 6: मुंडुप विवाह को किस प्रकार के मूल्यों से जोड़ता है? उत्तर: मुंडुप यह सिखाता है कि विवाह दिखावे या विलासिता पर नहीं, बल्कि संस्कारों, प्रेम और पारिवारिक मूल्यों पर आधारित होना चाहिए।
प्रश्न 7: मुंडुप और वेद में क्या अंतर है? उत्तर: वास्तव में लगन मुंडुप या वेद कोई दो अलग-अलग वस्तुएँ नहीं हैं, बल्कि एक ही पारंपरिक विवाह अनुष्ठान को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग नामों से जाना जाता है। फिर भी, कुछ क्षेत्रीय और प्रयोग संबंधी अंतर देखने को मिलते हैं। मुंडुप: यह नाम मुख्य रूप से ऊपरी हिमाचल, शिमला क्षेत्र और कुछ मध्य हिमाचली क्षेत्रों में प्रचलित है। वेद: कांगड़ा, हमीरपुर, बिलासपुर, मंडी, कुल्लू और आसपास के क्षेत्रों में इसे वेद कहा जाता है।
प्रश्न 8 : हिमाचली वेद में आधुनिक तकनीक और इलेक्ट्रिक/डिजिटल इंटीग्रेशन का क्या महत्व है? उत्तर: आज के समय में पारंपरिक हिमाचली वेद को आधुनिक तकनीक और इलेक्ट्रिक/डिजिटल माध्यमों के साथ सजाया और उपयोग किया जा रहा है। इससे विवाह संस्कार अधिक आकर्षक, सुविधाजनक और सोशल मीडिया फ्रेंडली बनते हैं, जबकि परंपरागत पवित्रता बनी रहती है।
हिमाचली वेद / लगन मुंडुप में नए ट्रेंड्स और तकनीकी बदलाव
इलेक्ट्रिक या लाइटिंग वाले वेद:
अब कुछ आधुनिक विवाह आयोजक LED लाइट या पावर लाइट के साथ वेद को सजाते हैं।
लकड़ी के पारंपरिक वेद पर हल्की रोशनी डालकर इसे आधुनिक और आकर्षक बनाया जाता है।
हिमाचल प्रदेश की लोक संस्कृति में नृत्य और संगीत का महत्वपूर्ण स्थान है। यहां प्रस्तुत हैं प्रमुख लोक नृत्य जो लोक गीतों के साथ गहराई से जुड़े हैं।
झमकड़ा (Jhamakda) : महिलाओं द्वारा किया जाने वाला पारंपरिक नृत्य है। झमकड़ा जो विशेष रूप से राज्य के निचले पहाड़ी इलाकों में जैसे काँगड़ा, हमीरपुर, बिलासपुर में शादियों के समय बहुत ही प्यारा महिलाओं द्वारा किया जाने वाला पारंपरिक नृत्य है। यह एक जीवंत और ऊर्जा से भरा नृत्य है। आमतौर पर यह नृत्य पुरुषों और महिलाओं के समूहों द्वारा किया जाता है । यह नृत्य परंपरागत हिमाचली लोक वाद्यों जैसे ढोल, नगाड़ा इत्यादि से नाच करके किया जाता है।
नाटी : नाटी हिमाचल प्रदेश का सबसे प्रसिद्ध पारंपरिक लोक नृत्य है, जो मुख्य रूप से मंडी, कुल्लू, हमीरपुर, कांगड़ा और कई अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में लोकप्रिय है। नाटी का उपयोग: शादियों, त्योहारों, मेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बहुत किया जाता है। आजकल तो देस विदेश में भी सांस्कृतिक कार्यक्रमों में नाटी करते हुए लोग मिलेंगे। नाटी हिमाचली ढोल, नगाड़ा और बांसुरी जैसे वाद्यों से सजाया जाता है और यह नृत्य समूह में ही परफॉर्म किया जाता है। जहाँ पुरुष और महिलाएँ अक्सर अलग-अलग या साथ में प्रदर्शन करते हैं। आजकल तो कम्पटीशन के तौर पर भी स्कूल और कॉलेजेस में और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में नाटी होती है। नाटी नृत्य हिमाचल की संस्कृति, एकता और खुशी का प्रतीक माना जाता है और यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोक गीतों के साथ संरक्षित किया गया है।
घुराई (Ghurai) : घुराई हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर, मंडी और आसपास के क्षेत्रों का एक पारंपरिक लोक नृत्य है। यह नृत्य खुशी, उत्सव और सामुदायिक समारोहों का प्रतीक है और अक्सर शादियों, मेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में किया जाता है। यह नृत्य समूह में किया जाता है, जिसमें पुरुष और महिलाएँ दोनों भाग ले सकते हैं। इसमें नर्तक पारंपरिक ढोल, नगाड़ा और बांसुरी की धुन पर कदम उठाते हैं। शादियों, सामाजिक उत्सवों और मेलों में हर्षोल्लासपूर्ण वातावरण बनाने के लिए इस नृत्य का उपयोग होता है। यह नृत्य हिमाचल की लोक संस्कृति और सामाजिक एकता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
ढोलरू नाटी (Dholru Naati) : ढोलरू नाटी हिमाचल प्रदेश का एक पारंपरिक लोक नृत्य है, जो मुख्य रूप से काँगड़ा , मंडी, हमीरपुर, बिलासपुर क्षेत्रों में प्रचलित है। इसे विशेष रूप से त्योहारों और धार्मिक पर्वों के अवसर पर किया जाता है।ढोलरू नाटी न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि यह स्थानीय संस्कृति, सामाजिक मेल-जोल और सामुदायिक एकता का प्रतीक भी माना जाता है।
खरैट (Kharait) : खरैट हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर और बिलासपुर क्षेत्रों का एक पारंपरिक लोक नृत्य है। यह नृत्य मेलों, सामुदायिक समारोहों और उत्सवों में विशेष रूप से प्रदर्शन किया जाता है। यह नृत्य समूह में किया जाता है, जिसमें पुरुष और महिलाएँ दोनों भाग ले सकते हैं। खरैट नृत्य में तेज-तर्रार और ऊर्जावान कदम होते हैं, जो हिमाचल की लोक संस्कृति और समुदायिक एकता को जीवित रखते हैं।
घोड़ी (Ghodiya Geet / Dance) : घोड़ी हिमाचल प्रदेश का एक पारंपरिक लोक नृत्य है, जो मुख्य रूप से कांगड़ा , हमीरपुर और बिलासपुर क्षेत्रों में प्रचलित है। यह नृत्य विवाह समारोहों के दौरान विशेष रूप से किया जाता है। महिलाएँ और पुरुष अलग-अलग या कभी-कभी समूह में प्रदर्शन करते हैं। नर्तक हाथों और पैरों की मुद्राओं के साथ ताल से मेल खाकर नृत्य करते हैं। इसकी मुख्य भूमिका विवाह संबंधी रस्मों में उत्साह और हर्ष व्यक्त करने के लिए होता है
लोसर नाटी (Losar Naati) : लोसर नाटी हिमाचल प्रदेश का एक पारंपरिक लोक नृत्य है, जो मुख्य रूप से मंडी और किन्नौर क्षेत्रों में प्रचलित है। इसे लोसर त्यौहार और अन्य सांस्कृतिक अवसरों पर प्रस्तुत किया जाता है। यह नृत्य समूह में किया जाता है, जिसमें पुरुष और महिलाएँ दोनों भाग ले सकते हैं। लोसर नाटी नृत्य हिमाचल की लोक संस्कृति, सामाजिक एकता और उत्सवों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
धाम नाटी (Dhaam Naati) : धाम नाटी हिमाचल प्रदेश का एक पारंपरिक लोक नृत्य है, जो मुख्य रूप से हमीरपुर और मंडी क्षेत्रों में प्रचलित है। यह नृत्य विशेष रूप से भोज (धाम) और सामुदायिक समारोहों के बाद किया जाता है। धाम नाटी नृत्य हिमाचल की लोक संस्कृति और सामुदायिक एकता को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
चंबा नाटी (Chamba Naati): चंबा नाटी हिमाचल प्रदेश का एक पारंपरिक लोक नृत्य है, जो मुख्य रूप से चंबा और कांगड़ा क्षेत्रों में प्रचलित है। यह नृत्य प्रकृति, प्रेम और सांस्कृतिक उत्सवों के अवसर पर किया जाता है। पारंपरिक ढोल, नगाड़ा और बांसुरी की धुन के साथ नर्तक कदम उठाते हैं। यह शादियों, मेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में आनंद और उत्साह व्यक्त करने के लिए किया जाता है। और हिमाचल के संस्कृति को जोड़े रखने में सहायक है।
आप सभी लोगों को पता है की हिमाचल प्रदेश अपने त्योहारों , सांस्कृतिक एवं मुख्य अनुष्ठानों के लिए बहुत ही प्रशिद है
हिमाचल का हर जगह , जिला , किसी न किसी , त्योहार, सांस्कृतिक यह फिर किसी न किसी अनुष्ठान के लिए जाना जाता है।
आज हम हिमाचल के कुछ त्योहारों के बारे में आपको बताना चाहते हैं जिनकी अपनी जगह में बहुत महत्ब है।
1 ) कुल्लू दशहरा (Kullu Dussehra)
कुल्लू का दशहरा देश विदेश में बहुत ही पॉपुलर है। इस दशहरे में दुनिआ भर के लोग आते है इसका एक भव्य उद्घाटन किया जाता है। इसकी विशेषता यह है की इसकी शुरुआत जब देश में जहाँ दशहरा खत्म होता है, वहीं यह कुल्लू घाटी में इसकी शुरुआत होती है।
कुल्लू दशहरा का मुख्या आकर्षण : कुल्लू दशहरा विश्व प्रसिद्ध उत्सव है जिसमे 200 से अधिक देवी देवताओं के भव्य रथ यात्रा निकाली जाती है। इस का लाइव प्रशारण होता है , हिमाचल प्रदेश के गणमान्य लोग इस अवसर पर मजूद होतें हैं। इस मेले में देवताओं का महामिलन या देव सम्मेलन भी कहा जाता है, जहाँ आस्था और संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। देश विदेश से लोग देखने के लिए आते हैं।
कुल्लू दशहरा 7 दिन चलता है , और कुल्लू घाटी में मनाया जाता है।
2 ) मंडी शिवरात्रि (Mandi Shivratri)
मंडी शिवरात्रि जो की “छोटी कशी ” से भी लोग जानते हैं। यह एक हिमाचल प्रदेश का बहुत ही प्रसिद्द धार्मिक एवं सांस्कृतिक उत्सव है , यह पर्व भगवान शिव जी को समर्पित है। यह हिमाचल मंडी शहर में मनाया जाता है।
मंडी शिवरात्रिका मुख्या आकर्षण : यह सात दिनों तक मेला चलता है। इस छोटी कशी में दुनिया भर के लोग शिवरात्रि पर आते हैं , और यंहा पर सेकंडों देवी देवताओं की शोभायात्राएँ निकाली जाती है ।
यह सात दिनों तक मेला चलता है। इस छोटी कशी में दुनिया भर के लोग शिवरात्रि पर आते हैं , यंहा पर सेकंडों देवी देवताओं की शोभायात्राएँ निकाली जाती है , भजन कीर्तन , सांस्कृतिक कार्यक्रम और पारंपरिक मेल-मिलाप होता है, एक से एक गायक अपनी परफॉरमेंस देते हैं देखने में बहुत ही आकर्षक लगता है। यह भक्ति , आस्था और लोक संस्कृति का प्रतीक है।
मंडी शिवरात्रि उत्सव महाशिवरात्रि के दिन से ही शुरू और सात दिनों तक चलता है।
3) किन्नौर का फूलैच (Phulaich) / फूल उत्सव
यह और किन्नौर का एक प्रसिद्ध फूलैच उत्सव है। फूलैच को “फूलों का त्योहार” भी कहा जाता है। इसमें गांव् के लोग उच्च पहाड़ियों से जंगली फूलों से विशेष फूल चुनकर लाते हैं जिनको लोकल भाषा में “माथा” भी कहते हैं।
फूलैच इस त्यौहार की विशेषता : यह त्यौहार पूर्वजों और देवी देवताओं को समर्पित होता है। उन फूलों को देवताओं को अर्पित किया जाता है। इसके बाद पूरे गाँव में इन फूलों को बाँटा जाता है और लोग इन्हें आशीर्वाद स्वरूप अपने घर ले जाते हैं। इस दौरान संगीत, नृत्य और लोकगीतों और भोज का आयोजन होता है। यह उत्सव किन्नौर की समृद्ध लोकसंस्कृति को दर्शाता है। फूलैच उत्सव (किन्नौर, हिमाचल प्रदेश) की अवधि लगभग 7 से 10 दिन होती है।
4) फागली (Fagli ) / फागुल पर्व
फागली हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति और किन्नौर क्षेत्रों में मनाया जाने वाला एक प्रमुख पारंपरिक उत्सव है।
इस पर्व की विशेषता: यह है की इस उत्सव का मुख्य संदेश बुराई पर अच्छाई की विजय, अंधकार पर प्रकाश की जीत है, और फसल कटाई के बाद वसंत ऋतु का स्वागत और स्थानीय संस्कृति और समृद्धि का प्रतीक का पर्व माना जाता है।
लोग विशेष रंग विरंगे मुखौटे पहनकर नाचते हैं, टॉर्च और दीपक जलाते हैं, स्थानीय भाषा में इसको “बुशान” या “बुशेश” कहा जाता है। अपनी घरों को खूब सजाते हैं।
इस दिन देवी देवताओं की गॉवों में पूजा की जाती है और घर-घर जाकर समृद्धि व खुशहाली की प्रार्थना की जाती है। लोक नृत्य , लोकगीत , नृत्य किये जाते हैं और मिलजुल कर भोजन करते हैं।
यह पर्व प्रायः फरवरी महीने में, शीत ऋतु के अंत और वसंत के आगमन पर मनाया जाता है।
5 ) सैर उत्सव (Sair Festival)
सैर पर्व हिमाचल के अधिकतर भागों में मनाया जाता है , मंडी, कांगड़ा, हमीरपुर, बिलासपुर, सोलन, शिमला, कुल्लू और भी कई अन्य
इस पर्व की विशेषता : यह बरसात के मौसम की विदाई और नई फसल के स्वागत के रूप में मनाया जाता है। सैर उत्सव को प्रकृति, फसल और पशुधन के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक माना जाता है।
इस अवसर पर स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा एवं शोभायात्राएँ भी निकाली जाती हैं , श्रद्धा के साथ गाँवों में लाया जाता है। इस दिन लोग अपनी नई फसल और मवेशियों की पूजा करके प्रकृति और देवताओं का आभार व्यक्त करते हैं। लोग मक्की, खीरा, अखरोट, कद्दू, चावल जो भी नया फल आदि से देवताओं को भोग लगाया जाता है और परिवार और समाज में , पकबान और उपहार एक दूसरे को आदान प्रदान करते हैं। इस दिन लोग सांस्कृतिक कार्योक्रमों का आयोजन करते हैं जिसमे लोकगीत , न्रत्य और मेले इत्यादि होते हैं।
सैर उत्सव सितंबर के मध्य में मनाया जाता है। यह उत्सव हिमाचल की सामाजिक एकता और सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने वाला त्योहार है ।
6) बसोआ / बिशु (Basoa / Bishu Festival)
बसोआ / बिशु हिमाचल प्रदेश में कई हिस्सों जैसे किन्नौर, लाहौल-स्पीति, हमीरपुर, बिलासपुर, कांगड़ा, चम्बा , मंडी और भी कई हिस्सों में मनाया जाने वाला एक प्राचीन लोक पर्व है।
उत्सव की विशेषता: इस पर्व को नई फसल काटने की बाद और वसंत ऋतु के आगमन पर मनाया जाता है। बसोआ के दौरान गाँव के लोग अपने देवी-देवताओं और पूर्वजों की पूजा करते हैं। नए नए व्यंजन और पकवानों से पारिवारिक देवी-देवताओं और पूर्वजों की पूजा करते हैं।
इस उत्सव में लोग सामूहिक मेलों का आयोजन, सांस्कृतिक कार्यक्रम , रंग रंग-बिरंगे परिधानों में लोक नृत्य , लोकगीत एवं संगीत प्रस्तुत करते हैं।
कई जगाओं पर खेलों , कुस्ती यह दंगल का भी आयोजन होता है।
यह त्योहार गाँववासियों के बीच भाईचारा बढ़ाने और समुदायिक जीवन को मज़बूत करने का भी है।
बसोआ उत्सव बैसाख (अप्रैल) में मनाया जाता है। स्थानीय समुदायों में खुशहाली, समृद्धि और सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है।